10 मिनट में डिलीवरी का दबाव, 15 घंटे की मेहनत में सिर्फ 700 रुपये: स्विगी-जोमैटो-ब्लिंकिट के डिलीवरी पार्टनर हड़ताल पर

नई दिल्ली | 10 मिनट में डिलीवरी का दबाव, दिन के 15–16 घंटे काम और बदले में महज़ 700–800 रुपये की कमाई। यही हकीकत है देश के लाखों गिग वर्कर्स की, जो स्विगी, जोमैटो और ब्लिंकिट जैसे बड़े प्लेटफॉर्म्स के लिए काम कर रहे हैं। इसी शोषण और असुरक्षा के खिलाफ आज यानी 31 दिसंबर को देशभर के गिग वर्कर्स हड़ताल पर हैं।

इसका असर न्यू ईयर की पार्टी की तैयारियों पर भी पड़ सकता है, क्योंकि क्विक कॉमर्स और फूड डिलीवरी सेवाएं बाधित होने की आशंका है। इससे पहले 25 दिसंबर (क्रिसमस) को भी गिग वर्कर्स ने हड़ताल की थी।


हिमांशु थपलियाल का वीडियो बना आंदोलन की आवाज

ब्लिंकिट के पूर्व डिलीवरी पार्टनर हिमांशु थपलियाल का वीडियो इस पूरे मुद्दे का प्रतीक बन गया। उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल से ताल्लुक रखने वाले 19 वर्षीय हिमांशु दिल्ली के किदवई नगर में रहते हैं।

29 सितंबर को पोस्ट किए गए वीडियो में हिमांशु बताते हैं कि:

  • 15 घंटे काम

  • 28 ऑर्डर

  • 50 किलोमीटर की दूरी

  • कुल कमाई सिर्फ 762 रुपये

उन्होंने कहा,

“5 किलोमीटर तक के ऑर्डर के लिए पहले 80 रुपये मिलते थे, अब 50 कर दिए गए। इलेक्ट्रिक गाड़ी का रोज़ 200–250 रुपये किराया देना पड़ता है।”

यह वीडियो इंस्टाग्राम पर 75 लाख से ज्यादा बार देखा गया, और आम आदमी पार्टी के सांसद राघव चड्ढा ने इसे संसद में उठाया। हिमांशु ने बाद में ब्लिंकिट का काम छोड़ दिया, लेकिन गिग वर्कर्स की समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं।


परिवार भी भुगत चुका है गिग वर्क की मार

हिमांशु के पिता अरविंद थपलियाल भी पहले स्विगी के लिए काम कर चुके हैं। वे बताते हैं,

“कभी-कभी पूरे दिन काम करने के बाद सिर्फ 200–250 रुपये बचते थे। इससे घर चलाना नामुमकिन है।”


‘2 किमी की डिलीवरी के सिर्फ 20 रुपये’

56 वर्षीय सुरेंद्र (बदला हुआ नाम), जो ढाई साल से जोमैटो में काम कर रहे हैं, कहते हैं:

  • 2 किलोमीटर की डिलीवरी पर सिर्फ 20 रुपये

  • ट्रैफिक या लोकेशन की दिक्कत का कोई बहाना नहीं चलता

  • देर हुई तो रेटिंग डाउन या ID ब्लॉक

सुरेंद्र बताते हैं कि उन्हें सिर्फ 1 लाख रुपये का दुर्घटना बीमा मिला, जबकि एक्सीडेंट में कुल खर्च 1.75 लाख रुपये हुआ। बाकी पैसे उन्हें कर्ज लेकर चुकाने पड़े।


महिला डिलीवरी पार्टनर की अलग पीड़ा

शाहदरा की रहने वाली नेहा (बदला हुआ नाम), डेढ़ साल से स्विगी में काम कर रही हैं। वे कहती हैं:

  • एक ऑर्डर पर सिर्फ 15 रुपये

  • 15–16 घंटे काम के बाद 700–800 रुपये

  • न वॉशरूम की सुविधा, न सुरक्षा

नेहा बताती हैं,

“पीरियड्स के दौरान बाहर रहना मुश्किल हो जाता है। छुट्टी लो तो उस दिन की कमाई जीरो।”

कस्टमर की शिकायत पर उनकी ID कई बार 2–2 दिन के लिए बंद कर दी जाती है।


‘10 मिनट डिलीवरी सिस्टम खत्म होना चाहिए’

डिलीवरी पार्टनर अमित (बदला हुआ नाम) कहते हैं:

  • सुबह 10 बजे से रात 11 बजे तक काम

  • 1000 रुपये कमाने के लिए 14–15 घंटे

  • पेट्रोल में ही 200 रुपये खर्च

उनका कहना है कि 10 मिनट में डिलीवरी का सिस्टम जानलेवा दबाव बन चुका है


वर्कर नहीं, ‘पार्टनर’ – इसलिए सैलरी नहीं

गिग इकोनॉमी में कंपनियां डिलीवरी बॉय को कर्मचारी नहीं, बल्कि ‘पार्टनर’ मानती हैं। इसी वजह से:

  • सैलरी नहीं

  • PF, पेंशन, मेडिकल जैसी सुविधाएं नहीं

  • इंसेंटिव और रेटिंग के जरिए काम का दबाव

नीति आयोग (2022) के मुताबिक:

  • भारत में 77 लाख गिग वर्कर्स

  • 2030 तक यह संख्या 2.5 करोड़ तक पहुंच सकती है


रिपोर्ट: ‘Prisoners on Wheels’

2024 में यूनिवर्सिटी ऑफ पेंसिल्वेनिया की रिपोर्ट के अनुसार:

  • 25% ड्राइवर 14–16 घंटे काम करते हैं

  • 43% रोज़ाना खर्च के बाद सिर्फ 500 रुपये बचा पाते हैं

  • 86.5% शारीरिक दर्द से जूझ रहे हैं

रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि दलित और आदिवासी समुदाय के वर्कर्स सबसे ज्यादा ओवरवर्क कर रहे हैं।


एक्सपर्ट की राय

गिग वर्कर्स एसोसिएशन के नीतेश दास कहते हैं,

“जब तक डिलीवरी पार्टनर को कर्मचारी का दर्जा नहीं मिलेगा, तब तक कोई कानून उन्हें सुरक्षा नहीं दे पाएगा।”

वहीं यूनियन नेता निर्मल गोराना अग्नि का कहना है कि,

“रेटिंग सिस्टम और इंसेंटिव के नाम पर जबरन मजदूरी करवाई जा रही है।”


निष्कर्ष:

गिग वर्कर्स की यह हड़ताल सिर्फ कमाई का सवाल नहीं, बल्कि सम्मान, सुरक्षा और इंसानी कामकाजी हालात की मांग है। 10 मिनट की सुविधा के पीछे छुपी इस मेहनत की कीमत कौन चुका रहा है, यह सवाल अब सरकार, कंपनियों और समाज – तीनों से जवाब मांग रहा है।

Written By

Rajat Kumar RK

Desk Reporter

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