नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने महिला अधिकारों से जुड़ा एक ऐतिहासिक और संवेदनशील फैसला सुनाते हुए कहा है कि किसी भी महिला को उसकी मर्जी के खिलाफ मां बनने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। शीर्ष अदालत ने महाराष्ट्र की एक 18 वर्षीय यौन उत्पीड़न पीड़िता को 30 हफ्ते की गर्भावस्था में भी गर्भपात की अनुमति दे दी है।
यह युवती उस समय गर्भवती हुई थी, जब वह नाबालिग थी। मामले की सुनवाई जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने की। बेंच ने कहा कि महिला की शारीरिक अखंडता, गरिमा और अपनी मर्जी से निर्णय लेने का अधिकार सर्वोपरि है।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि कोई भी अदालत या संस्था किसी महिला को अनचाही गर्भावस्था जारी रखने के लिए बाध्य नहीं कर सकती। अगर कोई महिला स्पष्ट रूप से यह कह रही है कि वह बच्चे को जन्म नहीं देना चाहती, तो उसकी इच्छा का सम्मान किया जाना चाहिए।
अदालत ने कहा—
“अपीलकर्ता के बच्चे का मेडिकल तरीके से गर्भपात किया जा सकता है।”
सुनवाई के दौरान जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने इस फैसले से जुड़ी नैतिक और मानवीय जटिलताओं का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि जन्म लेने वाला बच्चा भी एक जीवन होता है, इसलिए यह फैसला आसान नहीं था।
हालांकि उन्होंने यह भी जोड़ा कि जब युवती बार-बार कह रही है कि वह मां नहीं बनना चाहती, तो अदालत का कर्तव्य है कि वह महिला की इच्छा और अधिकारों को प्राथमिकता दे।
अदालत ने यह सवाल भी उठाया कि जब कानून 24 हफ्ते तक गर्भपात की अनुमति देता है, तो विशेष परिस्थितियों में 30 हफ्ते पर रोक क्यों होनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि इस मामले में यह बहस गौण है कि संबंध सहमति से थे या उत्पीड़न का मामला था। मुख्य तथ्य यह है कि—
गर्भ अनचाहा है
युवती मानसिक और सामाजिक संकट में है
वह मां नहीं बनना चाहती
ऐसी स्थिति में महिला को अपनी जिंदगी से जुड़ा फैसला लेने का पूरा अधिकार है।
शीर्ष अदालत ने मुंबई के जेजे अस्पताल को आदेश दिया है कि वह पीड़िता का मेडिकल गर्भपात कराए। साथ ही यह भी निर्देश दिए गए हैं कि पूरी प्रक्रिया के दौरान सभी मेडिकल प्रोटोकॉल और सुरक्षा मानकों का सख्ती से पालन किया जाए।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला महिलाओं के प्रजनन अधिकार, शारीरिक स्वायत्तता और गरिमा को मजबूती देने वाला है। यह निर्णय स्पष्ट संदेश देता है कि कानून का उद्देश्य किसी महिला को पीड़ा में धकेलना नहीं, बल्कि उसे अपने जीवन और शरीर पर अधिकार देना है। यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक मजबूत कानूनी मिसाल बनेगा।
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