पंजाब: करीब 23 साल पुराने चर्चित पत्रकार रामचंद्र छत्रपति हत्याकांड में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह को इस मामले में बरी कर दिया है। हालांकि अदालत ने तीन अन्य दोषियों कुलदीप सिंह, निर्मल सिंह और कृष्ण लाल की उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा है।
इस फैसले के साथ ही लंबे समय से चल रहे इस हाई-प्रोफाइल केस में एक नया मोड़ आ गया है। हालांकि राम रहीम को इस मामले में राहत जरूर मिली है, लेकिन वह अभी भी जेल में ही रहेगा क्योंकि साध्वियों के यौन शोषण मामले में उसे 10 साल की सजा हो चुकी है।
इस मामले में पहले 17 जनवरी 2019 को पंचकूला की विशेष CBI कोर्ट ने राम रहीम समेत चारों आरोपियों को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। कोर्ट ने माना था कि पत्रकार की हत्या एक साजिश के तहत कराई गई थी।
इसके बाद सभी आरोपियों ने इस फैसले को पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। लंबे समय तक चली सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने सबूतों का पुनर्मूल्यांकन किया और फैसला सुनाया।

फैसला सुनाते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि मामले में राम रहीम को साजिशकर्ता साबित करने के लिए पर्याप्त और ठोस सबूत मौजूद नहीं हैं। अदालत ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्य यह साबित नहीं करते कि हत्या की साजिश में राम रहीम की सीधी भूमिका थी।
हालांकि अदालत ने यह भी माना कि तीन अन्य आरोपियों के खिलाफ मौजूद गवाहों और सबूतों से उनकी भूमिका स्पष्ट होती है। इसी आधार पर कुलदीप सिंह, निर्मल सिंह और कृष्ण लाल की सजा को बरकरार रखा गया।
इस फैसले के बाद पत्रकार रामचंद्र छत्रपति के बेटे अंशुल छत्रपति ने निराशा जताई है। उन्होंने कहा कि CBI ने इस मामले में मजबूत पैरवी की थी और सभी जरूरी सबूत भी पेश किए गए थे।
अंशुल ने कहा कि राम रहीम को इस तरह बरी किया जाना गलत है और वे इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगे।
राम रहीम की ओर से पेश वकील बसंत राय ने अदालत में कई तकनीकी दलीलें दीं। उन्होंने कहा कि मामले में सबूतों के साथ छेड़छाड़ की आशंका है।
वकील ने दावा किया कि पत्रकार को जो गोली लगी थी वह सॉफ्ट लेड से बनी थी, जो आमतौर पर स्नाइपर या सैन्य हथियारों में इस्तेमाल होती है। उन्होंने यह भी कहा कि गोली को जिस डिब्बे में रखा गया था वह पूरी तरह सीलबंद था।
ऐसे में सवाल उठता है कि जब सील कभी खोली ही नहीं गई, तो फोरेंसिक लैब में उसकी जांच कैसे की गई। वकील ने यह भी कहा कि इतने वर्षों के बाद गोली पर मौजूद निशान भी साफ दिखाई नहीं दे रहे हैं।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने भी इस मामले में मौजूद कुछ तकनीकी पहलुओं पर सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि गोली पर किसी प्रकार का स्पष्ट निशान दिखाई नहीं दे रहा है।
कोर्ट ने यह भी पूछा कि फोरेंसिक विशेषज्ञों ने अपने हस्ताक्षर गोली पर किए थे या उसके कंटेनर पर। इस पर शिकायत पक्ष के वकील ने बताया कि हस्ताक्षर कंटेनर पर मौजूद हैं, जबकि गोली पर निशान समय के साथ मिट गए हो सकते हैं।
पत्रकार रामचंद्र छत्रपति हरियाणा के सिरसा जिले के रहने वाले थे। उन्होंने वर्ष 2000 में वकालत छोड़कर अपना अखबार शुरू किया था।
साल 2002 में उन्हें एक गुमनाम चिट्ठी मिली थी, जिसमें डेरा सच्चा सौदा में साध्वियों के साथ यौन शोषण के आरोप लगाए गए थे। छत्रपति ने 30 मई 2002 को इस चिट्ठी को अपने अखबार में प्रकाशित कर दिया।
इसके बाद उन्हें लगातार धमकियां मिलने लगीं, लेकिन उन्होंने डेरे के खिलाफ लिखना जारी रखा।
19 अक्टूबर 2002 की रात को रामचंद्र छत्रपति अपने घर के बाहर मौजूद थे, तभी हमलावरों ने उन पर गोलीबारी कर दी। उन्हें पांच गोलियां मारी गईं। गंभीर हालत में उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जहां दो दिन बाद 21 अक्टूबर को उनकी मौत हो गई।
इस घटना के बाद पूरे देश में भारी विरोध हुआ और मामले की जांच CBI को सौंप दी गई थी।
पत्रकार रामचंद्र छत्रपति हत्याकांड में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट का यह फैसला एक बड़ा कानूनी मोड़ साबित हुआ है। अदालत ने सबूतों के अभाव में राम रहीम को बरी कर दिया, जबकि तीन अन्य दोषियों की सजा बरकरार रखी। हालांकि पीड़ित परिवार इस फैसले से संतुष्ट नहीं है और अब सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की तैयारी कर रहा है। ऐसे में यह मामला अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है और आगे भी कानूनी लड़ाई जारी रहने की संभावना है।
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