सवाईमाधोपुर। राजस्थान के सवाईमाधोपुर जिले में मोबाइल फोन पर लगातार रील्स देखने की आदत अब मनोरंजन की सीमा पार कर खतरनाक लत में बदल चुकी है। यह लत बच्चों, किशोरों और युवाओं के मानसिक संतुलन, शारीरिक स्वास्थ्य और सामाजिक रिश्तों पर गहरा नकारात्मक प्रभाव डाल रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार स्क्रीन पर समय बिताने से आंखों की रोशनी कमजोर हो रही है, सिरदर्द और तनाव बढ़ रहे हैं, नींद प्रभावित हो रही है और बच्चों की दिनचर्या पूरी तरह बदल रही है।
रील्स की लत मानसिक दबाव और सोच पर भी असर डाल रही है। पढ़ाई से दूरी बढ़ रही है और सोचने-समझने की क्षमता कम हो रही है। मनोचिकित्सकों के अनुसार यह लत धीरे-धीरे तनाव, चिड़चिड़ापन और डिप्रेशन को जन्म दे रही है। सामाजिक दूरी बढ़ रही है, पारिवारिक और दोस्ती संबंधों में संवाद कम हो रहा है। लगातार मोबाइल स्क्रीन पर टिके रहने से शारीरिक गतिविधियां घट रही हैं, बच्चों में मोटापा बढ़ रहा है और खेल-कूद व आउटडोर गतिविधियों से दूर रहने के कारण शारीरिक विकास प्रभावित हो रहा है।
जिला अस्पताल में प्रतिदिन ऐसे दो मामले सामने आ रहे हैं, जिनमें मोबाइल रील्स की लत का गहरा मानसिक प्रभाव देखा जा रहा है। डॉ. गौरव चंद्रवंशी, मनोचिकित्सक, जनरल हॉस्पिटल सवाईमाधोपुर, ने बताया कि यह लत बच्चों और युवाओं की सामान्य दिनचर्या और सामाजिक व्यवहार को प्रभावित कर रही है।
मुख्य कारण:
रील्स की लत केवल व्यक्तिगत समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक समस्या भी बन रही है। परिवारों में संवाद कम हो रहा है और बच्चों का समय मोबाइल पर अधिक बिताना उनके रिश्तों में दूरी और नकारात्मकता पैदा कर रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार केवल सरकारी सख्ती से इस समस्या का समाधान संभव नहीं है। अभिभावकों, शिक्षकों और सामाजिक संगठनों को मिलकर बच्चों को सकारात्मक दिशा देनी होगी। बच्चों के मोबाइल उपयोग का समय नियंत्रित किया जाए, उन्हें पढ़ाई, खेल और रचनात्मक गतिविधियों की ओर प्रेरित किया जाए।
डॉ. मनीष शर्मा, शिशु एवं बाल राग विशेषज्ञ, सवाईमाधोपुर के अनुसार मोबाइल बच्चों की जिंदगी का स्थायी हिस्सा बन चुका है, लेकिन अत्यधिक उपयोग उनके मानसिक संतुलन, शारीरिक विकास और सामाजिक रिश्तों पर गहरा नकारात्मक असर डाल रहा है। परिवार को बच्चों के स्क्रीन टाइम पर नजर रखनी चाहिए और स्वयं भी मोबाइल का सीमित उपयोग करना चाहिए।
निवारक उपाय:
परिवार का अनुशासन, सकारात्मक माहौल और सही मार्गदर्शन ही बच्चों को इस खतरनाक लत से बचा सकता है और उनके मानसिक, शारीरिक और सामाजिक विकास को सुनिश्चित कर सकता है।
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