बांसवाड़ा में पारंपरिक ज्ञान से मानसून का अनुमान, ‘आभी’ और हवाओं से मौसम की भविष्यवाणी

दक्षिणी राजस्थान के बांसवाड़ा और वागड़ क्षेत्र में आज भी पारंपरिक ज्ञान और प्राकृतिक संकेतों के आधार पर मानसून और मौसम का अनुमान लगाने की परंपरा जीवित है। स्थानीय प्रकृतिप्रेमी और जानकार लोग हवाओं के रुख, बादलों की दिशा, नमी, पक्षियों की गतिविधियों और पेड़-पौधों के व्यवहार से मौसम की चाल को समझ लेते हैं।

स्तम्भ लेखक एवं भाषाविद् प्रकाश पण्ड्या के अनुसार ‘आभी’ नामक प्रक्रिया, जिसमें बादलों की उत्तर-दक्षिण आवाजाही होती है, मानसून के आगमन का महत्वपूर्ण संकेत मानी जाती है। मान्यता है कि नौतपा के बाद यदि आभी सक्रिय हो जाए तो लगभग 30 दिनों के भीतर मानसून सक्रिय हो जाता है और अच्छी बारिश की संभावना रहती है।

वागड़ क्षेत्र में इस पारंपरिक ज्ञान को पीढ़ी-दर-पीढ़ी संरक्षित किया गया है। यहां के ग्रामीण समाज में इसे “वादरा पाणी भरवा जाए” कहा जाता है, जिसका अर्थ है कि बादल बारिश लेकर आते हैं। इसके अलावा डूंगरपुर के भीलूड़ा क्षेत्र में रक्षाबंधन के दिन आने वाले वर्ष की बारिश का अनुमान लगाने की परंपरा भी प्रचलित है, जहां रघुनाथजी मंदिर में होने वाली रस्मों के आधार पर चौमासे की वर्षा का आकलन किया जाता है।

मई-जून के दौरान चलने वाली हवाओं की दिशा को ‘कोलमण’ कहा जाता है, जिसे मानसून की दिशा और समय का संकेत माना जाता है। यह परंपरागत मौसम ज्ञान आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में खेती और जीवनशैली के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।

आधुनिक मौसम विज्ञान के बावजूद यह पारंपरिक ज्ञान लोगों में उत्सुकता का विषय बना हुआ है और वैज्ञानिक अध्ययन के लिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है।

Written By

Chanchal Rathore

Desk Reporter

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