उज्जैन में डोल ग्यारस के मौके पर शहर के अलग-अलग इलाकों से डोल और झांकियों के साथ चल समारोह निकाले गए। विभिन्न मार्गों से होते हुए ये डोल हरसिद्धि मंदिर की ओर पहुंचे। शहर में भगवान के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ नजर आई।
इसी अवसर पर प्रसिद्ध काल भैरव मंदिर से बाबा काल भैरव की सवारी भी निकाली गई। सवारी से पहले बाबा का विशेष श्रृंगार किया गया। परंपरा के अनुसार सिंधिया परिवार की ओर से बाबा काल भैरव को पगड़ी धारण कराई गई।
सवारी रवाना होने से पहले कलेक्टर और एसपी ने बाबा काल भैरव की प्रतिमा का विधि-विधान से पूजन और आरती की। इसके बाद बाबा की सवारी रवाना हुई।
बाबा काल भैरव की सवारी जब केंद्रीय जेल भैरवगढ़ पहुंची तो जेल अधीक्षक मनोज साहू ने पालकी में विराजित बाबा का पूजन और आरती की। इस दौरान पुलिस बल ने जेल गेट पर बाबा को गार्ड ऑफ ऑनर दिया। जेल के अंदर मौजूद बड़ी संख्या में कैदियों ने भी बाबा के दर्शन किए।
वहीं किशनपुरा स्थित मंदिर से निकलने वाले भगवान श्रीकृष्ण के मुख्य डोल का महापौर मुकेश टटवाल और निगम अध्यक्ष कलावती यादव ने पूजन-अर्चन किया। भगवान श्रीकृष्ण की आरती कर शहर की सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना की गई।
श्योपुर में डोल ग्यारस के अवसर पर भव्य डोल शोभायात्रा निकाली गई। शोभायात्रा में करीब 50 देव विमान और 12 अखाड़े शामिल हुए। विभिन्न मार्गों से गुजरती हुई शोभायात्रा टोड़ी गणेश मंदिर पहुंची और इसके बाद बंजारा डैम की ओर रवाना हुई।
शोभायात्रा के दर्शन के लिए जिलेभर से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे। जगह-जगह लोगों ने देव विमानों के दर्शन किए और पूजा-अर्चना की। जयकारों से पूरा शहर भक्तिमय नजर आया।
देवास जिले के हाटपीपल्या में डोल ग्यारस की करीब 150 साल पुरानी परंपरा आज भी निभाई जाती है। यहां भगवान नरसिंह की करीब साढ़े 7 किलो वजनी पाषाण प्रतिमा को भमोरी नदी में तीन बार तैराने की परंपरा है।
स्थानीय मान्यता के अनुसार प्रतिमा के नदी में तैरने या डूबने को आने वाले वर्ष के संकेतों से जोड़कर देखा जाता है। इस परंपरा को देखने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।
मंडला के आजाद वार्ड स्थित करीब 150 साल पुराने राधा-कृष्ण मंदिर में डोल ग्यारस पर एक अनोखी परंपरा निभाई जाती है। यहां भगवान कृष्ण का ही नर्मदा में जल विहार कराया जाता है, जबकि राधा रानी मंदिर में ही विराजमान रहती हैं।
मंदिर से जुड़े लोगों के अनुसार, 1918 में राधा-कृष्ण की मूर्तियों को ले जा रही नाव नर्मदा में पलट गई थी। दोनों मूर्तियां नदी में डूब गई थीं। बाद में भक्त वययो बाई की आराधना के बाद भगवान कृष्ण की मूर्ति मिल गई, लेकिन राधा रानी की मूर्ति नहीं मिली।
इसके बाद से यहां भगवान कृष्ण के अकेले जल विहार की परंपरा शुरू हुई। धार्मिक परंपरा के तहत कृष्ण की प्रतिमा को डोले में रस्सियों से बांधा जाता है।
डोल ग्यारस के अवसर पर इंदौर में भी विभिन्न समाजों की ओर से डोल और धार्मिक चल समारोह निकाले गए। शहर में मंदिरों और धार्मिक स्थलों पर विशेष पूजा-अर्चना हुई। श्रद्धालुओं ने भगवान के डोल के दर्शन कर आशीर्वाद लिया।
भोपाल में डोल ग्यारस का चल समारोह पहले ही निकाला जा चुका है। प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में धार्मिक आयोजनों के साथ डोल ग्यारस की परंपराएं निभाई जा रही हैं।
डोल ग्यारस को भगवान श्रीकृष्ण और विष्णु उपासना से जुड़ा महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है। इस दिन कई क्षेत्रों में भगवान के डोल को शोभायात्रा के रूप में निकाला जाता है और जल विहार की परंपरा निभाई जाती है। मध्य प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में इस पर्व से जुड़ी स्थानीय परंपराएं और धार्मिक मान्यताएं देखने को मिलती हैं।
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