कोटा। हाड़ौती संभाग में इस वर्ष सामान्य से काफी कम बारिश होने के कारण जल संकट गहराता जा रहा है। ऐसे में कोटा की करीब 200 साल पुरानी परंपरा एक बार फिर चर्चा में है। शहर के पाटनपोल स्थित 'गड़े भेरुजी' मंदिर को जमीन से निकालकर पूजा कराने की मांग तेज हो गई है। स्थानीय मान्यता है कि इस पूजा के बाद अच्छी बारिश होती है।
स्थानीय लोगों के अनुसार यह मंदिर सड़क से करीब पांच फीट नीचे स्थित है और केवल सूखे की स्थिति में ही इसे खुदाई कर बाहर निकाला जाता है। इसके बाद विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है और फिर मंदिर को दोबारा जमीन में स्थापित कर दिया जाता है।
पूर्व पार्षद एवं भाजपा नेता महेश गौतम लल्ली ने बताया कि यह परंपरा कोटा रियासत काल से चली आ रही है। मान्यता है कि एक बार भीषण सूखे के दौरान साधु-संतों के सुझाव पर गड़े भेरुजी की पूजा कराई गई थी, जिसके बाद पूरे हाड़ौती क्षेत्र में अच्छी बारिश हुई। तभी से बारिश की कमी होने पर यह परंपरा निभाई जाती है।
नगर निगम के रिकॉर्ड के अनुसार पिछले दो दशकों में कई बार गड़े भेरुजी की पूजा कराई जा चुकी है। पूजा के लिए नगर निगम खुदाई, पूजा सामग्री, बैरिकेडिंग, पंडित दक्षिणा और अन्य व्यवस्थाओं पर करीब 10 हजार रुपये खर्च करता है। पूजा का मुहूर्त पंडितों द्वारा निकाला जाता है और इसमें जनप्रतिनिधि, अधिकारी एवं स्थानीय लोग शामिल होते हैं।
जल संसाधन विभाग के अनुसार इस वर्ष हाड़ौती के जलाशयों में पानी का स्तर पिछले वर्ष की तुलना में काफी कम है। संभाग के 80 डैमों की कुल क्षमता 1569.01 एमसीएम है, लेकिन वर्तमान में इनमें केवल 591.98 एमसीएम पानी है, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह आंकड़ा 1019.23 एमसीएम था।
छोटे डैमों की स्थिति भी चिंताजनक है। 32 छोटे जलाशयों में अधिकांश 50 प्रतिशत से भी कम भरे हैं। वहीं बड़े 48 डैमों में से 35 जलाशयों में भी जलस्तर आधे से कम है।
बारिश के आंकड़े भी चिंता बढ़ा रहे हैं। पिछले वर्ष 20 जुलाई तक हाड़ौती में औसतन 594.54 मिमी वर्षा दर्ज की गई थी, जबकि इस वर्ष अब तक केवल 131.33 मिमी बारिश हुई है, जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग चार गुना कम है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि जल्द अच्छी बारिश नहीं हुई तो पेयजल और सिंचाई दोनों पर गंभीर असर पड़ सकता है। इसी कारण गड़े भेरुजी की पारंपरिक पूजा कराने की मांग लगातार जोर पकड़ रही है।
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